“नेता जी”- हिंदी कविता। By- Parijat Bhardwaj.

लहूलुहान थी सोन चिड़िया, वो हताहत हो चुकी थी ।
बार-बार वार सहकर, वर्तमान को खो चुकी थी ।।

पराधीन थी हवा, पराधीन था गगन ।
जंजीर थी बंधी रूह पर और ‘राज’ था मगन ।।

बने स्वर्ग अपनी पुण्यभूमि, हम स्वप्न मन में गढ़ रहे थे।
और विभूति जन्म लेकर, कटक में पल-बढ़ रहे थे ।।

जिनकी आँखों से तेज टपकता, शब्द-शब्द में जोश था ।
धमनियों में लहू धधकता, वो सुभाष चंद्र बोस था ।।

स्वतंत्रता के थे पुजारी, स्वीकार ना थी दासता ।
फूल त्याग कांटे अपनाए, अँधेरों में सुझाया रास्ता ।।

भिन्न उन्होंने मार्ग बतलाया, साथियों का भी साथ ना पाया ।
विदेशी धरती पर अपनी सेना बनायी, वो सेना, जिसने स्वतंत्रता दिलायी ।।

बर्मा होकर स्वदेश जब आयी, अंग्रेजों की नींव हिलाई ।
विद्रोह की धधकी ऐसी ज्वाला, कि रोक उसे कोई ना पाया ।।

होकर बलिदान देश पर, राष्ट्रभक्तों ने सफलता पायी ।
दुश्मन अपने घर को लौटे और घर-घर हमारे खुशियां आयीं ।।

इतना सब कुछ देकर के, अपने आप को खो करके,
नेताजी गुमनाम हुए, भारत माँ की शान हुए ।।

ना थी सिंहासन की लालच, ना राज उनकी कामना ।
खुली हवा में जीये भारत, इसके लिए की उपासना ।।

-Parijat✍️

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