1971 की जंग नौसेना का आक्रमण

  • सारंग थत्ते

     1971 के भारत पाक युद्ध की अधिकारिक शुरूवात 3 दिसंबर को मानी जाती है, जब पाकिस्तान के हवाई हमलों ने भारत के कई हवाई अड्डों पर बमबारी की. भारतीय वायुसेना तुरंत हरकत में आई और शाम  होते होते हमारे टैंक दस्ते सीमा पार कर चुके थे. नौसेना को भी काफ़ी समय से चौकस रहने को कहा गया था. भारतीय नौसेना ने अपने युद्धक जहाज़ों के लंगर उपर उठाए और हमारे रणबांकुरे हर मोर्चे पर देश की सुरक्षा की खातिर निकल पड़े थे. 13 दिन के इस युद्ध में पाकिस्तान को हमने करारी हार दी थी, उसके पूर्वीसूबे ईस्ट पाकिस्तान के बदले एक नये राष्ट्र ने जन्म लिया था. पश्चिमी पाकिस्तान युद्ध के बाद पाकिस्तान कहलाने लगा था.

     इस युद्ध से पहले 25 अप्रैल 1971 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने कैबिनेट की विशेष मीटिंग बुलाई थी. दिल्ली में ब्लॅक आउट था और कलकत्ता से आने वाला उनके जहाज़  को लखनऊ मोड़ दिया गया था. देर रात वो दिल्ली पहुँची थी. उस ख़ास कैबिनेट मीटिंग में सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ को भी बुलाया गया था. जनवरी 1971 से  बांग्लादेश से लाखों शरणार्थी भारत आ रहे थे, इंदिराजी इससे परेशान थीं. उन्होंने कहा कि शरणार्थियों को रोकना होगा, भले ही इसके लिए हमें युद्ध करना पड़े. लेकिन सैम मानेक शॉ ने कहा अभी हम इसके लिए अभी तैयार नहीं हैं. सेना प्रमुख के अनुसार कुछ ही दिनों में मानसून आने वाला है और इलाके में मूसलाधार बारिश होती है, नदियां समुद्र बन जाती हैं. वायुसेना हमारी मदद नहीं कर सकती. हम अगर युद्ध करेंगे तो युद्ध हार जाएंगे. मानेकशॉ ने उनसे युद्ध की तैयारी के लिए वक्त मांगा था. इंदिराजी मान गयी थी. तीनों सेनाओं को तालमेल और मानसून के तुरंत बाद होने वाले युद्ध की सूचना दी गयी थी.

ऑपरेशन ट्राइडंट

          पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय नौसेना का नेतृत्त्व नौसेना पोत मैसूर से एडमिरल कुरुविल्ला और वाइस एडमिरल एस.एन कोहली कर रहे थे जबकि पूर्वी तट पर वाइस एडमिरल कृष्णन ने मोर्चा संभाल रखा था.1971 की पाकिस्तान के साथ हुई जंग में भारतीय नौसेना ने कराची बंदरगाह पर अपनी पकड़ मजबूत की हुई थी. 3 दिसंबर को पाकिस्तान ने भारत के सैनिक अड्डों पर बमबारी की थी. भारतीय नौसेना ने पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान के बंदरगाहों पर आक्रमण के लिए रात का समय चुना था. इसकी खास वजह थी क्योंकि उस दौर में पाकिस्तान के पास रात में उड़ान भरने वाले हवाई जहाज नही थे. हमारी नौसेना ने तीन विद्युत श्रेणी की मिसाइल बोट, दो पनडुब्बी खोजी बोट और एक ईंधन टैंकर युद्ध पोत शामिल किया था. 4 दिसंबर 1971 को दोपहर के दो बजे हमारे इस बेड़े ने गुजरात के ओखा बंदरगाह से पाकिस्तान की ओर का रुख़ किया. हम समुद्र की लड़ाई के लिए तैयार थे.

   रात दस बजे तक हमारे युद्ध पोत कराची से कुछ दूरी पर थे. आईएनएस निपत के रडार ने दो पाकिस्तानी युद्धपोतों को अपने रडार पर देखा. दो मिसाइल दागी गयी और पाकिस्तानी युद्धपोत पीएनएस ख़ैबर को बर्बाद कर डुबोया गया. इसके अलावा एक व्यवसायिक पोत एमव्ही वीनस चैलेंजर जो पाक  वायुसेना के लिए गोलाबारूद ले जा रहा था को भी हमारी मिसाइल ने ध्वस्त किया. यह एक बड़ी कामयाबी थी.

     ऑपरेशन ट्राईडेंट के बाद 8-9 दिसंबर को ऑपरेशन पायथन हुआ. इसमें भारत के मिसाइल जहाज़ों ने फिर से कराची बंदरगाह पर हमला किया. इसमें पाकिस्तान के रिज़र्व फ्यूल टैंक को नष्ट किया गया और उसके तीन मर्चेंट शिप डूब गए. उसका नौसेना हेडक्वार्टर तहस नहस कर दिया गया. कराची पोर्ट कई दिनों तक जलता रहा. भारतीय नौसेना ने कराची बंदरगाह को निशाना बनाया था, कई बड़े ईंधन टैंकर बर्बाद किए गये थे. पाकिस्तानी नौसेना के पी एन एस मुहाफ़िज़ को भारतीय युद्ध पोत वीर ने बर्बाद कर डुबोया था. लगभग डेढ़ घंटे के इस आक्रमण में भारतीय युद्ध पोतों ने 6 मिसाइल दागी और दुश्मन के चार युद्ध पोत बर्बाद किए, साथ ही कराची बंदरगाह में ईंधन टैंकों को भारी आग से बर्बाद किया.ऑपरेशन ट्राइडंट के अंतर्गत कराची के पाकिस्तानी नौसेना अड्डे पर किए गये घातक हमले ने पाकिस्तान की नींद उड़ा दी थी. लगभग 500 पाकिस्तानी नौसैनिक इस आक्रमण में मारे गये थे. हमारे युद्ध पोत आई एन एस नीरघाट, वीर और निपत ने इस ऑपरेशन में प्रमुख भूमिका निभाई थी. नौसेना की इसी शिकंजे की वजह से भारतीय सेना और वायुसेना अपने इरादे में सफल रही थी.

पूर्वी समुद्र में नौसेना

       1971 की जंग में नौसेना ने पूर्वी क्षेत्र में पाकिस्तानी पनडुब्बी पीएनएस गाज़ी को डुबोया था. यह एक बहुत बड़ी कामयाबी थी. नवंबर 1971 में ही पूर्वी नेवल कमांड ने हमारे विमान वाहक पोत आईएनएस विक्रांत को बंगाल की खाड़ी में अन्य युद्ध पोतों के साथ इस तरह तैनात  किया गया था की पश्चिमी पाकिस्तान स किसी भी किस्म की मदद पूर्वी पाकिस्तान पहुँचना नामुमकिन था. फिर भी पाकिस्तान ने अपनी खास पनडुब्बी पीएनएस गाजी को 14 नवंबर 1971 को कराची से पूर्वी पाकिस्तान की तरफ भेजा था. इस पनडुब्बी को सर्वप्रथम हमारी विमान वाहक युद्ध पोत आईएनएस विक्रांत को डुबोना था. इसके अलावा दूसरा काम था – हमारे पूर्वी समुद्री तट पर समुद्री सुरंगे बिछाना था.

INS VIKRANT

    भारतीय नौसेना ने अपने युद्ध पोत आईएनएस राजपूत की बदौलत संचार का एक ऐसा जाल बुना जिसमे बेहद ज़्यादा मात्रा में विक्रांत के नाम से मेसेज भेजे गये – संदेशों की मात्रा इतनी ज़्यादा थी की पाकिस्तानी ख़ुफ़िया तंत्र को महसूस हुआ की यह सब विक्रांत से भेजा जा रहा है. एक संदेश में एक नाविक की तरफ से एक टेलिग्रॅम भेजा गया जिसमे पूछा गया था कि मां की हालत कैसी हैं. पनडुब्बी गाजी को अब विक्रांत की तलाश थी और संदेश के आने की जगह मद्रास ( अब चेन्नई ) के आसपास थी ऐसा संदेह था. आईएनएस राजपूत को हमारी नौसेना ने संदेश दिया गाजी के श्रीलंका के आसपास के इलाक़े में होने की खबर पक्की थी. इस पर आईएनएस राजपूत के व्दारा शुरू हुआ गाजी को ढूँढने का काम, राजपूत ने सभी एलेकट्रॉनिक उपकरण एवं लाइट बंद किए हुए थे और विशाखापट्नम की गोदी से बाहर आकर बंगाल की खाड़ी में समुद्र में तेज हरकत देखी. इसको देखते हुए डेप्थ चार्ज को दागा – जिसकी बनिस्पत गाजी जो अपने आपको छुपाने के लिए समुद्र की तलहटी की तरफ बढ़ रही थी को गहरा नुकसान हुआ और आईएनएस राजपूत की बारूदी सुरंगों (डेप्थ चार्ज) की वजह से गाजी कॉ तुरंत आग लग गयी. भारतीय नौसेना को अपना निशाना मिल चुका था. नौसेना इतिहास में गाजी का अंत बंगाल की खाड़ी के समुद्र में 3 / 4 दिसंबर की रात को लिखा गया. 4 दिसंबर 1971 की सफलता से प्रेरणा लेकर ही इस दिन को 1972 से नौसेना दिवस के रूप में मनाना शुरू किया था.  

( लेखक सेवा निवृत्त कर्नल हैं )

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