चीन के विमान वाहक युद्ध पोत

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चीन ने पिछले एक दशक में युद्ध पोत बनाने की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाए है. फिलहाल एशिया में सबसे बड़ा समुद्री जहाज़ों का जंगी बेड़ा उसके पास हैं जिसमे लगभग 300 जहाज़ है. चीनी सेना के नौसेना अंग को पीपल्स लिबरेशन आर्मी नेव्ही के नाम से जाना जाता है. इस समय चीन के पास दो विमान वाहक पोत मौजूद है, और तीसरे पोत के निर्माण की बातें सामने आ रही है. एक तरफ अमेरिका एशिया – प्रशांत क्षेत्र या इंडो – प्रशांत क्षेत्र में अपनी पैठ जमाने की भरसक कोशिश कर रहा है. दूसरी तरफ चीन व्दारा मानवीय टापू निर्माण का काम दक्षिण चीनी समुद्र में बड़े ज़ोर शोर से शुरू है – जो एक चिंता का विषय है. 2012 में चीन ने अपना पहले विमान वाहक पोत – लायोनिंग को नौसेना में शामिल किया था. इस विमान वाहक पोत की कहानी में छुपी है चीन की दूर दृष्टि एवं ताक़त. दरअसल यह पहला विमान वाहक पोत सोवियत यूनियन के यूक्रेन की निकोलायवे गोदी में बन रहा था और 1991 में इसे अधूरा छोड़ दिया गया था जब सोवियत रूस का विघटन हुआ था. इस आधे अधूरे युद्ध पोत की भी बेहद रोचक कहानी है.

लिओनिंग की कहानी

इस कहानी की शुरूवात 06 दिसंबर 1985 को हुई थी जब पूर्व सोवियत यूनियन ने प्रॉजेक्ट 1143.5 ( एडमिरल कुर्जनेत्सोव क्लास ) के विमान वाहक पोत का निर्माण शुरू किया था. 67,500 टन वजनी इस जंगी जहाज को नाम दिया गया था – वरयाग ! लेकिन इस बीच सोवियत यूनियन के टूटने के साथ ही इस जहाज का निर्माण बीच में रोक कर इसे यूक्रेन को दिया गया. लेकिन पैसे की कमी से रूस को इसे रोकना पड़ा, तब तक 70 प्रतिशत काम हो चुका था – मुख्यतः बाहरी ढाँचा बन चुका था और तकनीकी संयंत्र, हथियार, इंजन इत्यादि शामिल नही हुए थे. 1992 में पहली बार चीन ने इस जहाज में अपनी दिलचस्पी दिखाई, लेकिन सौदा तय नही हो पाया था, इसके बाद आधा बना हुआ यह जहाज वैसी ही हालत में छः साल पड़ा रहा और फिर इसे नीलाम करने की घोषणा हुई.

मकाऊ की एक कंपनी ने 20 मिलियन डॉलर में एक तैरता होटल बनाने के इरादे से इसे खरीदा था. 1999 में इसे यूक्रेन से पानी के रास्ते टो बोट व्दारा खींचकर दक्षिण अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते मार्च 2002 में चीनी समुद्र में लाया गया. डलियान शिपयार्ड, उत्तरी चीन में इसे कड़ी सुरक्षा के बीच रखा गया था. पहली बार इसे पीपल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (पीएलएएन) ने अपनी नौसेना के स्लेटी रंग में ढाँचे को रंग दिया, तब इस बात की पुष्टि हो गयी की इसका उपयोग किसी भी तरह से एक तैरते होटेल के लिए नही किया जाएगा. 2005 में वरयाग को सूखे डॉक में ले जाया गया और इसके निर्माण की प्रक्रिया दोबारा शुरू की गयी. चीनी सेना के नौसेना के प्रणेता लियू हुआंकइन्ग ने इस ढाँचे से एक बेहद उन्नत किस्म के विमान वाहक पोत के निर्माण की बात सन् 2008 में सार्वजनिक की थी. 27 अप्रेल 2009 को इस जहाज को एक अन्य सूखे डॉक में ले जाया गया, जहाँ इसमे इंजन और अन्य भारी संयत्र लगाने का काम होना तय था. टाइप 348 रडार और सी ईगल रडार इस पर लगाया गया साथ ही मिसाइल और अन्य हथियार लगाए गये जिसके चित्र विश्व में प्रकाशित हुए. काम की गति धीमी थी, लेकिन काम हो रहा था और विमान वाहक पोत अपना रूप धीरे – धीरे ले रहा था !

11 जुलाई 2011 को चीनी रक्षा मंत्रालय ने इस जहाज को अनुसंधान के लिए इस्तेमाल करने की बात कही और 10 अगस्त 2011 को समुद्र में परखने के लिए पहली बार उतारा, इसके बाद कई बार इसे समुद्र में परीक्षण के लिए भेजा गया, जुलाई 2012 में सबसे लंबी 25 दिन के समुद्री परीक्षण में इस पर जे – 15 लड़ाकू जहाजों और अन्य मिसाइल का परीक्षण हुआ. 23 सितंबर 2012 को आख़िर इस विमान वाहक पोत को नौसेना को सौंपा गया और तब इसका नामकरण – लिओनिंग रखा गया. लियोनिंग की शॉर्ट टेक ऑफ बट अरेस्टेड रिकवरी (एसटीओबीएआर) तकनीक में कम दूरी की हवाई पट्टी, 14 डिग्री का रैंप बना होता है जिससे जहाज को उड़ान भरने में मदद मिलती है, वही उतरने के समय तारों के खींचाव से उतरते जहाज को रोका जाता है.

दूसरा विमान वाहक पोत

नवंबर 2013 में दूसरे विमान वाहक पोत का निर्माण शुरू हुआ. चीन ने इस युद्ध पोत के बारे में शुरू में चुप्पी साधी हुई थी. मार्च 2015 में जब इसके मुख्य भाग का निर्माण शुरू हुआ तब डलियान बंदरगाह से कुछ तस्वीरें सामने आयी थी. मई 2016 में स्की जम्प रैंम्प की बनावट ने अपना रूप लेना शुरू किया था तब इस बात की पुष्टि हो गयी कि इस विमान वाहक पोत में आने वाले जहाज अर्रेस्टर बैरियर से ही रुकेंगे. 26 अप्रेल 2017 को इसे नौसेना में लॉंच किया गया था. 55,000 टन वजनी विमान वाहक पोत का नामकरण टाइप 001ए किया गया. हालाँकि इसे शेंडोंग नाम से जाना जाता रहा है. इसके बाद अप्रेल 2018 से इस पोत के समुद्री परीक्षण का दौर शुरू हुआ. अब तक तीन समुद्री परीक्षण हो चुके हैं टाइप 001ए विमान वाहक पोत की बनावट कई बिंदुओं में चीन के पहले विमान वाहक पोत – लायोनिंग के डिजाइन पर निर्भर है. इस पर हेलिकॉप्टर एवं जे-15 लड़ाकू जेट हवाई जहाज उड़ान भर सकेंगे. इस पोत में तेल के ईंधन से चलने वाले बॉइलर्स मौजूद है. इसकी लंबाई 315 मीटर है और वजन 55,000 टन डिस्‍पलेमेंट है. लायोनिंग के मुकाबले इस पर 44 हवाई जहाज़ एक वक्त में आ सकेंगे. (लायोनिंग में सिर्फ़ 36 जहाज़ थे) कंट्रोल टॉवर की जगह को घटा कर रनवे की चौड़ाई और लंबाई को बढ़ाया गया है. इसमे उत्तम किस्म के रडार इस्तेमाल किए गये है. यह उम्मीद की जा रही है कि पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सत्तर वीं सालगिरह पर इसे 1 अक्तूबर 2019 में नौसेना में अधिकारिक रूप से शामिल किया जाएगा.

तीसरा विमान वाहक पोत

जून 2018 में चीन की बंदरगाह में निर्माण हो रहे तीसरे विमान वाहक पोत की कुछ तस्वीरें लीक होकर मीडिया में सामने आयी थी. टाइप 002 नाम से प्रसिद्ध इस पोत में एक बड़ा और समतल रनवे या फ्लाइट डेक मौजूद होने की पुष्टि हुई. इस पर से जहाज़ों को उड़ान भरने के लिए एक तीरछा रनवे है और तीन एलेक्ट्रो मेग्नेटिक केटॅपल्ट लॉंचिंग सिस्टम की तस्वीरों से अमेरिका में खलबली मच गयी थी. चीन व्दारा इस नवीनतम प्रोद्योगिकी के उपयोग से उसकी क़ाबलियत और विमान वाहक पोत निर्माण में नयी उँचाई छूने का अहसास विश्व को हुआ. अमेरिका के सुपर कॅरियर्स में इस किस्म की प्रोद्योगिकी का उपयोग किया गया है.

यह कयास लगाई जा रही है की यह पोत 70,000 टन का सुपर कॅरियर होगा और यदि सब कुछ सही समयचक्र से चला तो 2021 तक इसको पानी में उतारा जा सकता है. इस नये और उन्नत किस्म के विमान वाहक पोत से चीन ज़्यादा युद्धक हवाई जहाज हवा में भेज सकेगा और तेजी के साथ यहाँ से उड़ान हो सकेगी. इस सबके साथ चीन की नौसेना को एक विशेष स्थान मिलने की उम्मीद है. यहाँ पाठकों को यह भी बताते चले की यह भी खबर आ रही हैं कि चीन अपने चौथे विमान वाहक पोत में न्यूक्लियर पॉवर का इस्तेमाल करने के लिए निरंतर कोशिश कर रहा है. चीन ने पिछले कुछ दशकों में पुराने जहाज ऑस्ट्रेलिया और सोवियत रूस से खरीदे थे. इन जहाज़ों में मेलबोर्न, मिन्स्क और किव्ह मुख्य रहे. पुराने हो चुके सेकंड हैंड विमान वाहक पोत क्लेमेंकियू फ्रांस से भी खरीदने की मंशा 1997 में पूरी नही हो सकी थी. मेलबोर्न को 1985 में ऑस्ट्रेलिया से खरीदा गया था लेकिन 2002 तक इसे पूरी तरह से तोड़ा नही गया था. इस पर चीनी इंजीनियरों ने रिवर्स इंजीनियरिंग करते हुए अपने ज्ञान की वृद्धि की थी.

70,000 टन डिस्‍प्लेसमेंट वाले विमान वाहक पोत को सुपर कॅरियर्स कहा जाता है. अमेरिका अकेला ऐसा देश हैं जिसके पास 10 निमित्ज क्लास के सुपर कॅरियर्स मौजूद है. इस समय सिर्फ़ अमेरिका के पास इस किस्म के सुपर कॅरियर मौजूद है जो न्यूक्लियर पॉवर से चलते है. इस समय अमेरिका के पास 10 ऐयर क्रॅफ्ट कॅरियर्स है, 62 डिसट्रायर्स, 75 पनडुब्बियाँ और तीन लाख तेईस हज़ार अमेरिकी सैनिक उसकी नौसेना में मौजूद है. चीन के पास 2020 तक 270 युद्ध पोत हो जाएँगे जबकि अमेरिका के पास 275 युद्धक पोत है. चीन के इन सुपर कॅरियर्स की बदौलत दक्षिण चीन समुद्र और दक्षिण एशिया में चीन की सैन्य शक्ति एक नये आयाम पर नज़र आएगी. वैसे चीन के आसपास के देशों पर उसका प्रभुत्व पाने के लिए उसे विमान वाहक पोतों की जरूरत नही, क्योंकि सभी देश उसके हवाई जहाजों और जमीनी मिसाइलों की मारक क्षमता के भीतर है. चीन के रक्षा विशेषज्ञों मानते हैं कि 2030 तक चीन के पास 5 या 6 विमान वाहक पोत हो जाएँगे. भारत के पास इस समय सिर्फ़ एक विमान वाहक पोत है – आई एन एस विक्रमादित्य ! दो अन्य विक्रांत और विशाल का निर्माण चल रहा है.

( चित्र इंटरनेट से साभार )
( लेखक सेवा निवृत्त कर्नल है )

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