भारतीय वायुसेना का गेम चेंज़र – भारवाहक चिनूक

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आलेख : सारंग थत्ते
पुलवामा हमले के बाद देश की सीमाओं पर संकट के बादल नज़र आ रहे थे. भारतीय वायुसेना ने अपने लड़ाकू जहाज़ों के बेड़े को सतर्क किया हुआ था और फिर खबर आयी जब बालाकोट में हमारे लड़ाकू जहाज़ों ने अचूक बमबारी से आतंकियों के गढ़ में भारी नुकसान पहुँचाया था. इससे पहले भारतीय वायुसेना और सेना की स्पेशल फोर्सस की कमांडो यूनिट ने उरी का बदला लिया था. तब हेलिकॉप्टरों का उपयोग किया गया था. वायुसेना अपनी ताकत का स्वरूप देश को दिखा रहा है.

25 मार्च : ऐतिहासिक दिन

भारतीय वायुसेना में भार वाहक चिनूक हेलिकॉप्टर 25 मार्च को शामिल किए जा रहे है. सितंबर 2015 में अमेरिका और भारत सरकार ने आपसी सहमति से 15 सीएच-47 एफ(आई) चिनूक हेलिकॉप्टर खरीदने का सौदा किया था जिसमे सात और हेलिकॉप्टर बाद में खरीदे जाने का प्रावधान है. कुल 15 हेलिकॉप्टर की पहली खेप के चार चिनूक चंडीगढ़ में स्थित वायुसेना की 126 हेलिकॉप्टर फ्लाइट (फेदर वेट) में विधिवत हिस्सा बनेंगे. इस समय चंडीगढ़ की यूनिट के पास आख़िरी चार एमआई-26 हेलिकॉप्टर है, जिनका नियमित उपयोग लेह और लद्दाख में भार ले जाने के लिए होता है.

चिनूक हेलिकॉप्टर को दुनिया भर में विविध और विषम स्थितियों में युद्ध-परीक्षण के दौर से गुज़ारा जा चुका है. भारतीय उपमहाद्वीप में मौजूद परिस्थितियों के अनुरूप इसके काम करने की क्षमता साबित हुई है, इसीलिए भारत सरकार ने इसे खरीदने का फ़ैसला लिया था. भारतीय इतिहास में इस किस्म का भार वाहक हेलिकॉप्टर पहली बार शिरकत कर रहा है. इसे हम यदि गेम चेंज़र कहें तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी. अमेरिका की बोइंग कंपनी से इस सिलसिले में बातचीत का प्रथम दौर 2006 में शुरू हुआ था और अब इसका असली उपयोग भारतीय पाइलट पहाड़ी इलाक़ों में भारी सामान, रसद, गोलाबारूद, सैनिकों को पहुँचा सकेंगे.

वायु सेना के पास लगभग 25 वर्ष पुराने एमआई सीरीज के हेलिकॉप्टर है जिसे हमने सोविएत रूस से खरीदा था. इनके रख रखाव में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा है. फिलहाल एमआई-26 हेलिकॉप्टर के रखरखाव में ज़्यादा समय और धन का व्यय हो रहा है. यह कहना ग़लत नही होगा की इस हेलिकॉप्टर को ज़्यादा समय ज़मीन पर रखरखाव के लिए बिताना पड़ता है बजाय हवा में उड़ान !

चिनूक की विशेषतायें

चिनूक का खाली वजन 10,185 किलोग्राम है जबकि एमआई-26 का वजन 28,200 किलोग्राम है, अर्थात लगभग 2.8 गुना भारी है. एमआई-26 का इंजिन इसको 17000 किलोवाट का पॉवर प्रदान करता है जबकि चिनूक को 7000 किलोवाट की ज़रूरत है. ईंधन की खपत में कम उँचाई पर दोनो ही तकरीबन समान ही है. भार ले जाने की क्षमता में चिनूक हेलिकॉप्टर एमआई-26 को मात देता है विशेषकर 21,000 फुट से उपर की उँचाई पर उड़ान भरने में, जिसमे एमआई-26 लगभग 12,495 किलोग्राम वजन ले जा सकता है जिसके लिए उसे 2800 किलोग्राम ईंधन चाहिए जबकि चिनूक उस उँचाई पर 8000 किलोग्राम वजन आसानी से ले जा सकता है और ईधन की खपत मात्र 1000 किलोग्राम है. इसलये यह कहा जा सकता है कि चिनूक में हम धन की बचत कर रहें है.

भारी सामान उठाने की क्षमता रखने वाला ये दो रोटर का चिनूक सर्वप्रथम 21 सितंबर 1961 को अमेरिका में उड़ाया गया था. तब से अब तक इसमे अनेक प्रोद्योगिकी के अनुरूप सुधार लाए गये है और उन्नत किस्म के 15 चिनूक हेलिकॉप्टर हमे मिल रहें है. चिनूक को श्रेय मिला था जब इस हेलिकॉप्टर ने विएतनाम की लड़ाई में भारी गोलाबारी के बीच अपना कार्य किया था. इसीके साथ अभी हाल के अफघानिस्तान के युद्ध में भी पर्वतीय क्षेत्र में बेहद कठोर परिस्थिति में सैनिकों को साजो सामान पहुचाने का काम किया था. बोइंग कंपनी अब तक 1200 से अधिक चिनूक बेच चुकी है. इस हेलिकॉप्टर के अनेक संस्करण या प्रकार मौजूद है एवं असैनिक प्रयोग के लिए भी इसे इस्तेमाल किया जाता रहा है. भारी वजन को इस हेलिकॉप्टर से लटका कर भी ले जा सकते है – जिसमे आर्टिलारी की गन, एफ15 हवाई जहाज और छोटे टैंक भी शामिल है. दूर दराज के क्षेत्र में जहाँ हवाई जहाज नही उतारा जा सकता वहाँ सेना के काम को पूरा करने की ज़िम्मेवारी इन्ही भारवाहक हेलिकॉप्टरों पर होती है. वायुसेना को दूरगामी इलाकों में भारी सामान, हथियार और गोला – बारूद की सप्लाई के लिए चिनूक सी एच 47 एफ (आई) हेलिकॉप्टर दिए हुए मानकों में उपयुक्त पाया गया है. चिनूक में 50 हथियार से लैस सैनिक या 6.5 टन वजन का साजो सामान ले जाने की क्षमता है.

दो टेक्सट्रन लयकोमिंग टी55-एल712 एंजिन्स और दो बड़े पंखों या रोटर की सहायता से चिनूक भारी माल ढोने में असरदार है. लगभग 1500 फुट प्रति मिनिट की गति से यह उपर उठता है. आगे से पीछे तक दोनो पंखों के साथ 100 फीट की लंबाई है. इसके कॉकपिट में दो पायलट और एक इंजीनियर उन्नत किस्म के डिजिटल उपकरण से इसे चलाते है, रात में उड़ान भरने की क्षमता है, एचएफ और यूएचएफ संचार रेडियो का समावेश है तथा दोस्त और दुश्मन को पहचान ने वाला आईएफएफ इंटेरोगेटर भी मौजूद है. जरुरत के मुताबिक मिसाइल अटॅक से बचाव के लिए काउंटर मेजर्स लगाए जाते है, एक बेहद नवीनतम रडार प्रणाली जिसे रेथेओन कंपनी ने इजात किया है – एएन / एपीक्यू 17ए इसे संचालन मे सहयोग देता है. इस हेलिकॉप्टर के भीतर 42 वर्गमीटर का स्थान सामान ले जाने के लिए है जिसमे दो हम्वी ( हाइ मोबिलिटी मल्टी पर्पज व्हीलड वेहिकल – एचएमएमडब्ल्यूव्ही ) वाहन या एक हम्वी और एक 105 एमएम आर्टिलरी गन हेलिकॉप्टर के भीतर रख कर ले जा सकते है. एक बार में 3900 लीटर ईंधन भरा जा सकता है और तीन अतिरिक्त ईंधन टैंक इसके भीतर के सामान कक्ष में ले जाने का प्रावधान है.

अन्य देशों में

अमेरिकी चिनूक ने अपनी करतबगारी विएतनाम युद्ध (1966), मध्य पूर्व की खाड़ी की लड़ाई और अफ़ग़ानिस्तान में दिखायी थी. अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, कॅनडा, जापान, नॉर्वे, स्पेन, ब्रिटेन, अमेरिका, मिस्र, ग्रीस, लीबिया, और मोरोको के पास चिनूक हेलिकॉप्टर मौजूद है. अमेरिका ने 100 वाँ सीएच 47एफ चिनूक 2010 में खरीदा था. इस मॉडेल के अलावा अमेरिका की वायुसेना के पास 380 और चिनूक है. रक्षा विश्लेषकों का मानना है की भारत की रक्षा तय्यारियों में चिनूक की बेहद अहम भूमिका होगी, वही साजो सामान को अग्रिम मोर्चे तक ले जाना या ज़रूरत पड़ने पर सैनिकों की टुकड़ियों को तुरंत किसी भूभाग में भेजना चिनूक जैसे हेलिकॉप्टर से सहजता से हो पाएगा. सैनिकों और उनके सामान को ले जाने के अलावा अन्य भूमिकाओं में एयर आंब्युलन्स, पैराशूट ड्रॉप, खोज और बचाव, आपदा राहत, अग्निशमन और भारी निर्माण भी शामिल हैं. चिनूक मध्य पूर्व के रेगिस्तान में ऑपरेशन डेजर्ट शील्ड और डेजर्ट स्टॉर्म (1990–91 ) में हिस्सा ले चुका है. अमन चैन के दिनों में हमारी आंतरिक सुरक्षा या आपदा प्रबंधन में इस प्रकार के भार वाहक हेलिकॉप्टर काँटे की भूमिका निभाएँगे इसमे कोई संदेह नही है. यह नये भारत की पहचान बन रही है. देश की सीमाओं की रक्षा करना हमारा दायित्व है. एक नयी सोच के साथ भारतीय वायु सेना में परिवर्तन की लहर बेहद ज़रूरी है और प्रगती के पथ पर इस देश को ले जाने में एक प्रमुख कदम हवा में रखा जा रहा है – इस पर हर भारतीय को गर्व होना चाहिए. चिनूक पर्वतीय क्षेत्र में अब एक गेम चेंज़र साबित होगा, इसमे कोई शक नही है.

( लेखक सेवा निवृत्त कर्नल है )

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