सेना में उच्च पदों पर महिलायें

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आलेखसारंग थत्ते

महिलाओं के लिए यूरोप में दूसरे विश्व युद्ध से पहले भी सेना में महिलाओं के लिए काम दिया गया था. गोलाबारूद के कारखाने से लेकर अस्पतालों में सैनिकों की देखभाल की ज़िम्मेवारी बहुत पहले से इतिहस में दर्ज है. 1889 में भारत में नर्सिंग कोर की स्थापना की गयी थी और 1940 के दौर में बड़ी लड़ाई में 6000 नर्स इसमे शामिल हो चुकी थी. विश्व युद्ध में अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी में तथा कालांतर में विएतनाम और मध्यपूर्व के खाड़ी युद्ध में महिलाओं का योगदान रहा है. भारत से पहले श्रीलंका में 1984 में महिलाओं की भर्ती सेना में की गयी थी. भारतीय सेना के कुछ अंगों में 1991 में अधिकारी वर्ग में महिलाओं को शॉर्ट सर्विस कमीशन दिया गया था. एक समय था जब सेना में महिलाओं को जाने के विरोध में समाज में आवाज़ें उठती रही थी. लेकिन अब इस सदी में उनके लिए अनेक अवसर खोजे जा रहे है, परमानेंट कमीशन भी दिया जा रहा है. इस सब के बीच कुछ भारतीय महिला अधिकारियों ने शीर्ष पद पर पहुँच कर गौरव हाँसिल किया है.

लेफ्टिनेंट जनरल पुनिता अरोरा 

लेफ्टिनेंट जनरल अरोरा पहली भारतीय महिला सैन्य अधिकारी है, जिन्होने सेना में लेफ्टिनेंट जनरल रैंक हाँसिल किया. 37 सालों की बेदाग सर्विस में 15 मेडल हाँसिल किए और देश के कई सैन्य छावनियों में अपनी सेवायें दी. पुनिता अरोरा गाएनाकोलॉजिस्ट अर्थात प्रसूतिशास्री हैं.

स्वतंत्रता से पूर्व पुनिता का परिवार पाकिस्तान में रह रहा था. 1962 में उन्हे पुणे के प्रतिष्ठित आर्म्ड फ़ोर्सेस मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिला. डॉक्टर पुनिता अरोरा ने 1968 में सेना में कमीशन पाया था. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हे इंटर्नशिप के लिए अंबाला जाना पड़ा. उनकी पहली पोस्टिंग फतेहगढ़ में हुई थी. देश को 1971 की जंग का सामना करना पड़ा था. इस समय उनके पति जो सेना में मेडिकल अधिकारी थे, की पोस्टिंग श्रीनगर में थी और वह फतेहगढ़ में अपनी ड्यूटी दे रही थी. 14 मई 2002 को कालूचक फ़ौजी छावनी की एक यूनिट में आत्मघाती दस्ते ने आक्रमण किया था. तीन आतंकवादियों ने सिविल बस को अगवा किया था, 7 लोगों को मार डाला था और फिर सेना के इलाक़े में घुसकर 23 सैनिकों और उनके परिवार के सदस्यों को मौत के घाट उतारा था. घायल लोगो को अस्पताल पहुँचाया गया जहाँ पुनिता और उनके पति ड्यूटी पर थे. उनके व्दारा किए गये तुरंत प्रयासों के चलते घायल व्यक्तियों को जल्द सहायता प्रदान की गयी थी, जिससे कई जाने बच गयी थी. राष्ट्रपति ने उन्हे विशिष्ठ सेवा मेडल से नवाजा था.

पुनिता अरोरा को सेना मेडल से भी नवाजा गया था, उनकी मेहनत से सैनिक अस्पतालों में बांझपन और निःसंतान दंपतियों के लिए गाइनी – एंडोस्कोपी और ऑन्कोलॉजी की सुविधाएं और अग्रणी इनविट्रो-फर्टिलाइजेशन और सहायक प्रजनन तकनीक प्रदान करना संभव हो सका था. उनके पति ब्रिगेडियर पे एन अरोरा त्वचारोग विशेषज्ञ हैं, पुत्र स्क्वाड्रन लीडर संदीप अरोरा भी त्वचारोग विशेषज्ञ है और पत्नी सबीना भी सेना में थी. सेना में डॉक्टरों को तीनों सेनाओं में भेजा जा सकता है. इस प्रावधान के चलते उन्हे नौसेना में वाइस एडमिरल की पोस्ट पर भेजा गया था. उन्हे अति विशिष्ठ सेवा मेडल से भी सम्मानित किया गया था.

एयर मार्शल पद्मावथी बंडोपाध्याय

बचपन में अपनी माँ को अस्पताल में चिकित्सा कराने की जद्दोजेहद में आज की एयर मार्शल पद्मावथी बंडोपाध्याय ने अपने मन में पक्का विचार कर लिया था कि वह बड़ी होकर डॉक्टर ही बनेगी. नईदिल्ली के किरोरी माल कॉलेज से अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद 1962 में आर्म्ड फ़ोर्सेस मेडिकल कॉलेज, पुणे (एएफएमसी) के लिए परीक्षा में अव्वल आयी. लेकिन परिवार ने अपनी बेटी को इतनी दूर जाने से रोक दिया. अगले साल वह फिर से इस परीक्षा में शामिल हुई, परिवार को मनाया और एएफएमसी की दूसरी बॅच में शामिल हुई. पढ़ाई के उपरांत पद्मा ने वायुसेना में नौकरी करने का मन बनाया और एयर फोर्स अस्पताल बेंगालुरू में इंटर्न बनकर पहुँची. यहाँ उनकी मुलाकात उनके पति फ़्लाइट लेफ्टिनेंट सतीनाथ बंडोपाध्याय से हुई. 1968 में भारतीय वायुसेना में उन्हे कमीशन मिला लेकिन पाइलट ना बन सकी ल्योंकि उनकी आँखो में कुछ दोष पाया गया. उन्होने तब विमानन चिकित्सा के लिए 1975 में अपनी नई जिंदगी एक नये विषय में शुरू की थी. वे पहली महिला विमानन चिकित्सा अधिकारी बनी और अपनी सेवाकाल में 23 रिसर्च प्रॉजेक्ट पर काम किया और 27 अनुसंधान के आलेख लिखे.

1971 की जंग के समय वे अपने पति के साथ पंजाब में हलवारा एयरबेस पर थी. अपने काम को जुझारू रूप से पूरा करने के लिए प्रशंसा मिली और विशिष्ठ सेवा पदक से सम्मानित किया गया. यह पहला मौका था जब एक ही सम्मान समारोह में पति – पत्नी को यह पदक हाँसिल हुआ था. उन्होने उत्तरी ध्रुव में जाकर चार महीने भी बिताए थे. उन्हे सरकार ने इंदिरा प्रियदर्शनि सम्मान से भी नवाजा है. कारगिल युध के दौरान ग्रुप कैप्टन ओहदे पर उन्होने अग्रिम मोर्चों पर पहुँच कर चिकित्सा सुविधाओं का मुआयना किया था. 26 जून 2000 को पहली महिला एयर कोमोडोर बनी और 26 जनवरी 2002 को उन्हे अति विशिष्ठ सेवा मेडल से सम्मानित किया गया था. इसके बाद एयर वाइस मार्शल बनी और 1 अक्तूबर 2004 को एयर मार्शल बनी जो विश्व कीर्तिमान है.

मेजर जनरल माधुरी कानिटकर

पुणे के आर्म्ड फ़ोर्सेस मेडिकल कॉलेज की डीन है मेजर जनरल माधुरी कानिटकर. बारहवी की पढ़ाई तक उन्हे सेना के बारे में कोई आकर्षण नही था लेकिन जब पता चल तब वे इसके साथ तनमन से जुड़ गयी है. इसी कॉलेज से उन्होने एमबीबीएस की पढ़ाई में प्रथम स्थान हाँसिल कर गोल्ड मेडल प्राप्त किया था. पेशे से बाल रोग विशेषज्ञ हैं लेकिन समय के साथ उन्होने भारत में प्रथम बाल रोग किडनी विशेषज्ञ भी बनने का गौरव प्राप्त किया है. उन्होने बाल रोग चिक्तिसा में स्नातोकोत्तर पदवी हाँसिल की. एम्स नई दिल्ली से बाल रोग किडनी चिक्तिसा के क्षेत्र में ट्रेनिंग मिली और सिंगापुर एवं लंदन से भी उच्च शिक्षस प्राप्त की है. अब यह कोर्स ए एफ एम सी में भी पढ़ाया जा रहा है.

उन्हे एएफएमसी से 1982 में अपनी मेडिकल की अंतिम परीक्षा में उत्कृष्टता के लिए कलिंग ट्रॉफी से नवाजा गया था. दिसंबर 1982 में सेना चिकित्सा कोर में कमीशन दिया गया था. उन्होने एएफएमसी में विभिन्न पदों पर रहते हुए प्रशिक्षक की भूमिका निभाई है. इस दौरान उन्होने कई अनुसंधान के आलेख लिखे है और कई छात्रों को स्नातोकोत्तर पढ़ाई के लिए गाइड की भूमिका भी निभाई है. इसी संस्थान से वें कई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में अतिथि वक्ता की हैसियत से भी जा चुकी है. इंडियन सोसायटी ऑफ पीडियाट्रिक नेफरॉलॉजी की अध्यक्ष रह चुकी है. नई दिल्ली और पुणे में उनकी मेहनत से बच्चों में किडनी रोग की जाँच और निदान के लिए संस्थान चालू किए गये है.

एएफएमसी में एक डीन की हैसियत से कई नये प्रयोग और कदम उठाए है. अब कॉलेज में अनुसंधान के लिए नये व्दार खोले जा रहें है. उन्हे इस बात का मलाल है कि कई महिला अधिकारी सेना जल्दी छोड़कर चली जाती है – सिर्फ़ परिवार की खातिर. इसके लिए जरूरी है की जहाँ तक संभव हो पति – पत्नी की पोस्टिंग एक ही छावनी में की जाए. विशेष रूप से अब जब महिलाओं को परमानेंट कमीशन की बात हो रही है तब यह सवाल और गहराएगा. उन्हे उनकी सेवाओं के लिए सेना ने 2014 में विशिष्ठ सेवा मेडल तथा 2018 में अति विशिष्ठ सेवा मेडल से सम्मानित किया है. वें प्रधानमंत्री की साइंस, टेक्नालजी और इंनोवेशन टेक्निकल कौंसिल की सदस्य है जिसे भविष्य की योजनाओं पर मंथन करने की जिम्मेवारी दी है. मेजर जनरल माधुरी कानिटकर का चयन लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के लिए हो चुका है, फिलहाल स्थान रिक्त नही होने की वजह से उन्हे इस साल के अंत तक इंतजार करना होगा.

( लेखक सेवा निवृत्त कर्नल है )

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