भारतीय वायुसेना के युगपुरुष : मार्शल अर्जन सिंह

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आलेख : सारंग थत्ते

भारत के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले के उपर से भारतीय वायुसेना ने अपने 100 जहाज़ों को फ्लाइ पास्ट में उतारा था. इस दल का नेतृत्व हमारी वायुसेना के एक जाबांज अधिकारी ने किया था – नाम था विंग कमांडर अर्जन सिंग, जो उस समय एयर फोर्स बेस अंबाला में कार्यरत थे. शायद उन्हे भी नही पता था कि आकाश की यह उड़ान उन्हे आगे कहाँ तक ले जाएगी. वक्त के साथ उनकी प्रगती में दो युद्ध उन्हे देखने को मिले थे. लेकिन अंग्रेज़ो के साथ 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध में उनके अदम्य साहस कुशल नेतृत्व के लिए उन्हे डी एफ सी – डिस्टिंग्विश्ड फ्लाइयिंग क्रॉस ( प्रतिष्ठित उड़ान मेडल) से नवाजा गया था. आज हम देखेंगे भारतीय वायुसेना के एकमात्र जीवित पाँच सितारा मार्शल ऑफ द एयर फोर्स अर्जन सिंग की जीवन की उड़ान के कुछ यादगार पल जो हमें मालूम होने चाहिए.

अर्जन सिंह का जन्म 15 अप्रैल, 1919 को लायलपुर (अभी फैसलाबाद, पाकिस्तान) में हुआ था और उन्होंने अपनी शिक्षा मोंटगोमरी (अभी साहिवाल, पाकिस्तान) में पूरी की थी. 19 वर्ष की उम्र में पायलट ट्रैनिंग कोर्स के लिए चुने गए थे. एक निडर और कर्तव्यनिष्ठ वायुसैनिक अपने फ़ौजी पिता जो हडसन हॉर्स में रिसालदार थे और दादा तथा परदादा भी अंग्रेज़ो की सेना में रहे थे ; से प्रेरणा लेकर अंग्रेज़ो की रॉयल एयर फोर्स में दाखिल हुए थे. ब्रिटेन में कॉर्नवेल के वायुसैनिक स्कूल में अपने पंख पसारे थे और उड़ान का प्रशिक्षण लिया था. वर्ष 1944 में उन्होंने अराकन अभियान और इमफाल अभियान में स्क्वाड्रन लीडर के तौर पर अपने वायुसेना के नंबर 1 स्क्वाड्रन का नेतृत्व किया था.

फ़रवरी 1945 में अर्जन सिंग जब एक प्रशिक्षु पायलट को सीखलाई दे रहे थे तब उन्होने केरला में उसके घर के उपर से नीची उड़ान लगाई थी जो हुक्म के बर्खिलाफ थी. कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया से बच गये थे लेकिन एक फ़ाइटर पायलट बनने के लिए ऐसी कलाबाज़ियाँ करना आना चाहिए
ऐसा उन्होने कहा था. अंग्रेज़ो के जमाने में ऐसी हरकत वाकई में दिलेरी का परिचायक थी! मार्शल अर्जन सिंह जीवनभर चार सिद्धांतों पर चले – पहला अपने पेशे के प्रति ईमानदार रहो, दूसरा अपने कार्य का निवर्हन इस तरह करो कि सभी उससे संतुष्ट हों, तीसरा अपने अधीनस्थ पर विश्वास रखो और चौथा लक्ष्य हासिल करने के लिए ईमानदार और गंभीर प्रयास करो. उनका मानना है कि यदि आप इन सिद्धांतों पर चलते हैं तो आप कभी गलती नहीं कर सकते.

1948 में उन्होने ग्रुप कॅप्टन के रैंक को संभाला और वायुसेना मुख्यालय में प्रशिक्षण के डाइरेक्टर बनाए गये. इसके बाद दस वर्षो में वे एयर वाइस मार्शल के पद पर पद्दोनत हुए. ग्रुप कैप्टन के तौर पर उन्होंने अंबाला क्षेत्र की कमान संभाली. एयर कमोडोर बनने के बाद उन्हें एक संचालन बेस का प्रमुख बनाया गया जो बाद में पश्चिमी वायु कमान के नाम से जाना गया. चीन के साथ 1962 की लडाई के बाद 1963 में उन्हें वायु सेना उप प्रमुख बनाया गया. पाकिस्तान के साथ 1965 की जंग में भारतीय वायुसेना का नेतृत्व कर चुके अर्जन सिंह का कहना है कि अगर संयुक्त राष्ट्र बीच में न आ गया होता और अगर जंग कुछ दिन और खिंची जाती तो फिर भारत की जीत निर्णायक हुई होती.

एक अगस्त 1964 को जब वायु सेना अपने आप को नयी चुनौतियों के लिए तैयार कर रही थी उस समय एयर मार्शल के रूप में अर्जन सिंह को इसकी कमान सौंपी गई. वह पहले ऐसे वायु सेना प्रमुख हैं, जिन्होंने इस पद पर पहुंचने तक विमान उड़ाना नहीं छोड़ा था और अपने कार्यकाल के अंत तक वह विमान उड़ाते रहे. अपने करियर में उन्होंने 60 प्रकार के विमान उड़ाए, जिनमें द्वितीय विश्व युद्ध से पहले के तथा बाद में समसामयिक विमानों के साथ साथ परिवहन विमान भी शामिल हैं. वायुसेना प्रमुख बनाए जाने के समय उनकी उम्र बमुश्किल 44 साल थी. पाकिस्तान के खिलाफ लडाई में उनकी भूमिका के बाद वायु सेना प्रमुख के रैंक को बढाकर पहली बार एयर चीफ मार्शल किया गया. अपने कुशल नेतृत्व और दृढ़ता के साथ स्थिति का सामना करते हुए भारत की विजय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मार्शल की प्रशंसा करते हुए तत्कालीन रक्षामंत्री वाई बी चव्हाण ने कहा था कि एयर मार्शल अर्जन सिंह हीरा हैं, वह अपने काम में दक्ष और दृढ़ होने के साथ सक्षम नेतृत्व के धनी हैं. उन्हें नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया. सेवा निवृत होने पर उन्हें स्विटजरलैंड का राजदूत बनाया गया था. वायु सेना के लिए उनकी सेवाओं के लिए सरकार ने जनवरी 2002 में वायु सेना के मार्शल के रैंक से नवाजा. देश में पांच स्टार वाले तीन सैन्य अधिकारी रहे हैं, जिनमें से फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ और फील्ड मार्शल के एम करियप्पा . ये तीनों ही ऐसे सेनानायक अब जीवित नहीं हैं. आज 15 अप्रेल 2019 को मार्शल अर्जन सिंह की जन्म शताब्दी. नमन इस युग पुरुष को !

( लेखक सेवा निवृत्त कर्नल है )

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