हिंदी कविता- “संकल्प”

गुजर रही थी वीरों की टोली मन में यह संकल्प लेकर,

माँ करूँगा तेरी रक्षा प्राण लेकर या प्राण देकर ।

शौर्य, दया, साहस, प्रेम का था ये संगम निराला,

पर बुज़दिलों के हरकतों से दिन बना ये सबसे काला ।।

अपने-अपने आलयों में हम जब प्यार के धुन सुन रहे थे,

पुलवामा में सैनिक तब साथियों के शव चुन रहे थे ।

टुकड़े-टुकड़े हो चुके थे देह के हर भाग उनके,

और दहल गया था भारतवर्ष यह समाचार सुनके ।।

पाक की नापाक कृत के फिर हुए थे हम शिकार,

लहू के हरेक बूंद की थी अब बस यही पुकार,

घाटी के गद्दारों को सबक बड़ा सिखलाना है,

आतंक के जन्नत में घुसकर उन्हें जहन्नुम पहुँचाना है ।।

फिर मिराज़ की गर्जना सुन, कांप उठा सारा संसार,

और दानवों के अंत से सुख मिला सबको अपार।

अपने वायु वीरों का यह देश करता है वन्दन,

निश्चिन्त हैं सब क्योंकि हैं जाग रहे कई अभिनंदन ।।

-पारिजात भारद्वाज
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