कब रुकेंगे नौसेना में जानलेवा हादसे ?

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लेखक : सारंग थत्ते

भारतीय नौसेना के इतिहास में पिछले दस साल हादसों की दास्तान बयाँ करते हुए गुज़रे है. एक के बाद एक हर दूसरे या तीसरे महीने में किसी ना किसी नौसेना पोत पर किसी किस्म का हादसा हो रहा है. जानलेवा हादसों की वजह से यह अफ़सोस करने की श्रेणी में तीव्रता से जाँचें परखे जाते हैं. नौसेना ने एक तरफ बड़े पैमाने पर युद्ध पोत स्वदेश में निर्माण करने में क़ाबलियत दिखाई है लेकिन अब वक्त है जब इस किस्म के हादसे सेना के अनुशासन पर एक बदनुमा दाग प्रतीत होते है. तीनों सेनाओं की कार्यशैली में हर कार्य की रूपरेखा और कार्य की पद्धति लिखित रूप में मौजूद होती है. सिलसिलेवार इन्हे शांति और युद्ध के लिए अलग अलग खंडों में प्रकाशित किया जाता है और इन्हे समय समय पर उन्नत बबी किया जाता है. यह एक ऐसा डॉक्यूमेंट हर यूनिट में होता है जिसे हर अधिकारी को पढ़ना ज़रूरी होता है. स्टॅंडिंग ऑर्डर्स फॉर पीस एंड वॉर. इसके अलावा विशेष रूप से किसी भी कार्य को करने की सिलसिलेवार कार्य पद्धति आसान भाषा में लिखी जाती है एवं यूनिट के आख़िरी सैनिक तक समझाई जाती है.

आग से बचाव के तरीके और आग लगने पर उससे लड़ने की उपाय योजना को सेना से बेहतर कोई नही बयान कर सकता. इलेक्ट्रॉनिक संयत्र, मोटर गाड़ियाँ, ज्वलनशील पदार्थ, गोलाबारूद का भंडारण, अति संवेदनशील दस्तावेज़ों, सुरक्षा के इंतज़ाम, आग बुझाने के संयंत्र का रख रखाव, वर्क शॉप में सुरक्षा के मानक, साफ सफाई के निर्देश, आग लगने पर पूरी यूनिट की ज़िम्मेवारी की हर सप्ताह घोषणा – लगभग हर क्षेत्र में लिखित रूप में हुक्म बनाए जाते है और निर्देश आख़िरी व्यक्ति तक पहुँचाए जाते है. इस सबके बावजूद भी सुरक्षा में चूक होती है जो कुछ हद तक मानवीय है लेकिन नौसेना में विशाल युद्धपोतों में. बैटरी कक्ष में हादसे, इंजिन रूम में आग और रखाव में अनहोनी होने से बहुमूल्य जान की कीमत अब हर किसी की ज़ुबान पर है. इससे राष्ट्रीय नुकसान भी हो रहा है. आईएनएस सिंधुरत्न पनडुब्बी में 2 दो अधिकारियों की मौत हुई थी. तत्कालीन नौसेना प्रमुख एडमिरल जोशी ने 26 फ़रवरी 2014 को इस हादसे की ज़िम्मेवारी अपने उपर लेते हुए अपने पद से त्यागपत्र दिया था.

विगत शुक्रवार मुंबई में माझगाँव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड के अधीन निर्माणधीन युद्धपोत विशाखापट्टनम के दूसरे और तीसरे मंज़िल पर आग लगने से भारी नुकसान हुआ और एक असैनिक कर्मचारी इसमे जलने से हताहत हुआ है. आग लगभग चार बजे के आसपास लगी थी. नौसेना के बनाए जेया रहे युद्ध पोतों की नयी शूंखला प्रॉजेक्ट-15बी के तहत चार स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल डिसट्रायर बनाए जाने है – विशाखापट्टनम के अलावा मोरमुगाओ, इंफाल एवं पोरबंदर युद्धपोत है. 2021 के अंत तक विशाखापट्टनम को भारतीय नौसेना में शामिल किया जाना है. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार एक बड़े टैंक में ग्राइनडिंग का काम चल रहा था जब यह आग लगने की घटना हुई. शाम सात बजे तक इस आग पर काबू पाया जा सका था. इस पोत को इस हादसे से कितना नुकसान हुआ होगा यह कुछ दिनों के बाद पता चलेगा. लेकिन इस समय नौसेना की लंबी फेहरिस्त में एक और हादसा जुड़ गया है.

नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार 2007 से 2016 के बीच 38 हादसे हुए जिसमे 8 अधिकारी और 25 नौसैनिकों को जान की कीमत देनी पड़ी. सबसे ज़्यादा 12 हादसे 2013-14 में हुए थे. इन 38 हादसों में 15 आग लगने से हुए (39 प्रतिशत), 6 पोत तलहटी से टकराने से हुए, अन्य 6 नौसेना के युद्ध पोत आपस में टकराने से हुए और बाकी 11 विभिन्न कारणों से हुए जिसमे विषैली गॅस, सोनार को नुकसान, हवाई जहाज़ के हॅंगर और बिना कंट्रोल के पोत पानी में दूसरे पोत से टकराए. नौसेना ने अपने जवाब में यह बताया था की बड़ी ग़लती का कारण था नियत स्टॅंडिंग ओपरेटिंग प्रोसिज़र को ना अपनानाना, नेविगेशन में ग़लतियाँ, रडार और अन्य साधनों का ग़लत उपयोग, सामग्री की विफलता, इलेक्ट्रिकल शॉर्ट सर्किट तथा बिजली के उपकरणों में आग. विभिन्न हादसों में सबसे ज़्यादा 71 प्रतिशत हादसे (27) कार्मिकों की ग़लती की वजह से हुए थे.

सबसे पुराने हादसे का उल्लेख करते हुए महा लेखागार ने नीलगिरि श्रेणी के युद्धपोत आई एन एस विंध्यगिरी का उल्लेख किया है जिसने एक असैनिक परिवहन पोत को टक्कर 30 जनवरी 2011 में मारी थी. लगभग 72 करोड़ का यह युद्धपोत पानी मे से निकाला गया लेकिन नौसेना ने इसे इस्तेमाल के काबिल नही ठहराया. अप्रेल 2019 मे कर्नाटका के कारवार बंदरगाह में दाखिल होते समय भारत के एकमात्र विमान वाहक पोत आईएनएस विक्रमादित्य पर आग लगने का हादसा हुआ. इस आग को काबू करने के प्रयत्न में एक अधिकारी लेफ्टिनेंट कमांडर डी एस चौहान की मौत हो गयी थी. भारतीय युद्धपोतों के दुर्घटना के शिकार होने के हादसे में सभी छोटे बड़े युद्ध पोत शामिल है, जिसमे – आई एन एस त्रिशूल, प्रहार, दुनागिरी, पनडुब्बी सिंधूघोष, जलाश्वा, कुठार और रणवीर, मुंबई, विंध्यगिरी और एम व्ही नोर्दलेक (2011), पनडुब्बी सिंधुरक्षक (2013), कोंकण, तलवार, तरकश, बेतवा, विपुल, ऐरावत, पनडुब्बी सिंधुरत्न (2014), कोलकाता (2014), गंगा, कोची, विराट (2016), निरीक्षक, विक्रमादित्य (2016), डेगा, कुठार, नाशक, बेतवा (2016), प्रलय, कामोर्ता, कद्मत्त, शिवालिक, प्रलय, विक्रमादित्य (2019).

पनडुब्बी आईएनएस सिंधुरक्षक जो 2013 में दुर्घटना की शिकार हुई थी का मूल्य 404 करोड़ रुपये था. विभिन्न कोर्ट ऑफ एंक्वाइरी ने अपनी और से इस बात को ज़ोर देकर कहा है कि स्टॅंडिंग ओपरेटिंग प्रोसिज़र को बेहद गंभीरता से लेने की ज़रूरत है. अमेरिकी नौसेना, ऑस्ट्रेलिया नौसेना, सिंगापुर की रॉयल नौसेना के पास अलग से सुरक्षा का ज़िम्मे का दायरा मौजूद है. भारतीय वायुसेना में भी एक अलग प्रभाग मौजूद है जिसे फ़्लाइट सेफ्टी का जिम्मा दिया हुआ है. भारतीय नौसेना में 2006 में सोचा गये इस प्रभाग पर अक्तूबर 2012 में ज़मीन पर काम हुआ और 2014 में इसे अमल में लाया गया. फिलहाल एकीकृत तरीके से इस ज़रूरी प्रभाग पर अभी बहुत कुछ होना बाकी है.

भारतीय नौसेना सुरक्षा संगठन को अब प्राथमिकता देनी ही होगी, देश की समुद्रि सतह पर हमारी सुरक्षा की तैयारी को मजबूत करना ही होगा. नये नौसेना प्रमुख एडमिरल करमबीर ने नौसेना की बागडोर अपने हाथों में अभी हाल में ली हुई है एवं उन्हे अपने अधीन इस सुरक्षा संगठन को मजबूत बनाना होगा. इस देश को मामूली ग़लतियों से युद्ध पोतों का नुकसान एवं नौसेना के कार्मिकों की जान जोखिम में डालने से बचना होगा.

( लेखक सेवा निवृत्त कर्नल है )

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