हिन्दी कविता- “भक्षक”

दया, करुणा, और प्रेम,
यही तो है मानव की देन ।
विचित्र फिर ये दृश्य है,
चारित्रहीन मनुष्य है ।।

दुष्कर्म इसका कर्म हैं,
और ढाल इसका धर्म हैं ।
मासूमियत की कत्ल कर,
तनिक भी ना शर्म है ।।

अकल्पनीय अपराध है,
ये जघन्य पाप है ।
बच्चीयों को भक्षता,
ये नर रूपी सांप है ।।

बुद्विजीवी भी बुद्धिमान हैं,
बरसाती मेंढ़क के समान हैं ।
और न्याय की क्या बात करें,
इसका निर्भया को भी इंतजार है ।।

हम जात-धर्म में अटके हैं,
वास्तविक मुद्दों से भटके हैं ।
ट्विंकल-आसिफ़ा तो नाम है,
माँ भारती की बेटी, इनकी पहचान है ।।

अब और कलंकित देश ना हो,
भेड़िया कहीं बचा शेष ना हो ।
और ना ही बच पाये वो नेता,
जो कूकृत्य को उचित ठहरा देता ।।

कोई और कली अब ना टूटे,
कोई और फूल अब ना रूठे ।
अपना भारत खुशहाल रहे,
नसों में इसके संस्कार बहे ।।

– पारिजात भारद्वाज

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