हिन्दी कविता- “कारगिल की विजय यात्रा”

क्षण बड़ा गंभीर था,
लहू-लुहान शरीर था।
शत्रु से अनजान था,
वो समय बड़ा बलवान था ।।

जब धूर्तों ने अपनी चाल चली,
और सारे हदों को पार करी ।
कायरों ने अपना भेष बदल,
ले ओट छुपा हमारे घर ।।

फिर मिला ‘कालिया’ क्षत-विक्षत,
पहाड़ी पर खून से लथपथ ।
अरि के आँखों में आँखें डाल,
उसने की थी माँ भारती की जयकार ।।

अब आरम्भ हो चुका था रण,
और दहलने लगा था शत्रु का मन ।
जब गरजा आसमान से ‘नचिकेता’,
तब दुश्मन का हौसला टूटा ।।

बर्फ़ीली पहाड़ियों पर ‘विक्रम’,
दिखा रहा था अपना पराक्रम ।
एक-एक असुरों को खोज,
वध कर रहा था ‘मनोज’ ।।

दुर्गा माता की जयकार,
कर बढ़ रहा था ‘संजय कुमार’ ।
और जबतक ना हुई साँसें अंत,
तबतक लड़ा वीर ‘विजयंत’ ।।

द्रास, मश्कोह, तोलोलिंग, टाइगर हिल,
सब पर तिरंगा लहरा रहा था ।
विजय पाकर पूरा भारतवर्ष,
फूले नहीं समा रहा था ।।

शत्रु भी बड़ा विचित्र था,
स्वार्थी और चरित्रहीन था ।
अपने सिपाही के शवों को अस्वीकारा,
बुज़दिल और विवेकविहीन था ।।

हमने पूरा सम्मान किया,
सैनिकों सा मान दिया ।
यही है अपना संस्कार,
शत्रु से भी उचित व्यवहार ।।

सालों बीत चुके हैं अब,
पर याद है हमें वो कुर्बानी ।
वीर सपूतों ने त्यागा जब,
मातृभूमि के लिये जवानी ।।

                - पारिजात भारद्वाज

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